ग्रहण 2026 · भद्राचलम
इस वर्ष की सूची गणना में है।
सूतक: दिखने वाले सूर्य ग्रहण से 12 घंटे पहले, चंद्र ग्रहण के प्रच्छाया चरण से 9 घंटे पहले; न दिखे तो सूतक नहीं।
अन्य शहर
- खम्ममKhammam
- एलुरुEluru
- विजयवाड़ाVijayawada
- वरंगलWarangal
- गुंटुरGuntur
- रामागुंडमRamagundam
- विशाखापत्तनमVisakhapatnam
- हैदराबादHyderabad
- ओंगोलOngole
- विजयनगरमVizianagaram
- श्रीशैलमSrisailam
- चंद्रपुरChandrapur
- बीदरBidar
- कर्नूलKurnool
- नेल्लोरNellore
- भिलाईBhilai
- रायपुरRaipur
- नांदेडNanded
- नागपुरNagpur
- कलबुर्गीKalaburagi
- ब्रह्मपुरBrahmapur
- लातूरLatur
- परभणीParbhani
- तिरुपतिTirupati
सूर्य ग्रहण — महत्व
सूर्य ग्रहण को ज्योतिष और धर्म दोनों परंपराओं में महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका देवता सूर्य है, और ग्रहण काल में सूर्य की उपासना, जप तथा दान का विशेष विधान बताया गया है। ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार ग्रहण की तिथि और समय पंचांग के गणित से निकलते हैं, इसलिए यह हर वर्ष बदलता रहता है। इस पृष्ठ पर इस वर्ष तथा आने वाले दो वर्षों की तिथियाँ पंचांग के अनुसार दी गई हैं।
सूर्य ग्रहण के समय सूतक का विधान है। मान्यता है कि सूतक ग्रहण से लगभग बारह घंटे पूर्व आरंभ हो जाता है। सूतक काल में भोजन नहीं किया जाता और मंदिरों के कपाट बंद रहते हैं। ग्रहण के समाप्त होने पर स्नान करके शुद्धि की जाती है, और उसके बाद ही देव-दर्शन तथा भोजन आदि कार्य किए जाते हैं।
यह ध्यान रखना उपयुक्त है कि सूतक और ग्रहण संबंधी अनेक परंपराएँ क्षेत्र के अनुसार भिन्न हैं। उत्तर और दक्षिण भारत, तथा स्मार्त और वैष्णव परंपराओं में सूतक के समय और नियमों को लेकर मतभेद मिलते हैं। इसी प्रकार अमांत और पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार तिथियों का क्रम भी अलग हो सकता है। इसलिए अपने कुल-परंपरा अथवा स्थानीय पंचांग के अनुसार ही निर्णय लेना उचित माना जाता है। व्यक्तिगत कुंडली के संबंध में किसी भी निर्णय के लिए योग्य ज्योतिषी से परामर्श लेना बेहतर होता है।
व्रत विधि — चरण दर चरण
सूर्य ग्रहण के अवसर पर जो व्रत या संयम रखा जाता है, उसकी सामान्य विधि इस प्रकार बताई जाती है। यह विधि सरल और व्यावहारिक है, और इसे श्रद्धा तथा शांति के साथ किया जाता है।
- सूतक का पालन: ग्रहण से लगभग बारह घंटे पूर्व सूतक आरंभ माना जाता है। इस अवधि में भोजन नहीं किया जाता।
- मंदिर बंद: सूतक के समय मंदिरों के कपाट बंद रहते हैं; इस अवधि में देव-दर्शन नहीं किए जाते।
- जप और स्मरण: ग्रहण काल में सूर्य के नाम का जप, स्तोत्र पाठ अथवा ध्यान करना उचित माना जाता है।
- स्नान: ग्रहण समाप्त होने पर स्नान करके शुद्धि की जाती है।
- दान: शास्त्रों में ग्रहण के बाद दान का विधान है; यह अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार किया जाता है।
- देव-दर्शन: स्नान और शुद्धि के पश्चात ही मंदिर जाकर दर्शन किए जाते हैं।
यह क्रम केवल परंपरागत मार्गदर्शन है। किसी भी चरण को अपनी सुविधा, स्वास्थ्य और स्थानीय रीति के अनुसार अपनाया जा सकता है।
क्या खाएँ और क्या टालें
सूतक काल में भोजन न करने का निर्देश दिया गया है। यह उपवास या संयम के रूप में पाला जाता है, और इसका उद्देश्य मन तथा शरीर को शांत रखना माना जाता है।
- टालें: सूतक आरंभ होने के बाद भोजन ग्रहण न करें।
- टालें: सूतक काल में मंदिर न जाएँ, क्योंकि इस समय कपाट बंद रहते हैं।
- अपनाएँ: ग्रहण समाप्त होने पर स्नान करें, और उसके बाद ही भोजन तथा अन्य कार्य आरंभ करें।
जो लोग स्वास्थ्य कारणों से उपवास नहीं रख सकते, वे अपनी परिस्थिति के अनुसार निर्णय लें। यहाँ कोई चिकित्सीय सलाह नहीं दी जा रही है; अपने शरीर की स्थिति को प्राथमिकता देना उचित है।
पारण नियम
पारण अर्थात व्रत या संयम का समाप