एकादशी 2027 · दुबई
| तिथि | नाम | तिथि समय | पारण |
|---|---|---|---|
| रवि, 3 जनवरीअगला | सफलापौष · कृष्ण | शनि, 2 जन॰, 12:54 → रवि, 3 जन॰, 14:38 | सोम, 4 जन॰, 07:04 के बाद, 16:46 से पहले |
| सोम, 18 जनवरी | पौष पुत्रदापौष · शुक्लक्षय तिथि | सोम, 18 जन॰, 08:57 → मंगल, 19 जन॰, 06:20 | मंगल, 19 जन॰, 11:32 के बाद, 03:11 से पहले |
| मंगल, 2 फ़रवरी | षटतिलामाघ · कृष्ण | सोम, 1 फ़र॰, 07:11 → मंगल, 2 फ़र॰, 09:40 | बुध, 3 फ़र॰, 07:00 के बाद, 12:20 से पहले |
| बुध, 17 फ़रवरी | जयामाघ · शुक्ल | मंगल, 16 फ़र॰, 18:49 → बुध, 17 फ़र॰, 16:02 | गुरु, 18 फ़र॰, 06:51 के बाद, 12:58 से पहले |
| बुध, 3 मार्च | विजयाफाल्गुन · कृष्ण | बुध, 3 मार्च, 03:14 → गुरु, 4 मार्च, 05:54 | गुरु, 4 मार्च, 12:32 के बाद, 08:24 से पहले |
| गुरु, 18 मार्च | आमलकीफाल्गुन · शुक्ल | गुरु, 18 मार्च, 02:51 → शुक्र, 19 मार्च, 00:21 | शुक्र, 19 मार्च, 06:24 के बाद, 21:47 से पहले |
| शुक्र, 2 अप्रैल | पापमोचनीचैत्र · कृष्ण | गुरु, 1 अप्रैल, 23:15 → शनि, 3 अप्रैल, 01:22 | शनि, 3 अप्रैल, 07:46 के बाद, 02:57 से पहले |
| शनि, 17 अप्रैल | कामदाचैत्र · शुक्ल | शुक्र, 16 अप्रैल, 09:52 → शनि, 17 अप्रैल, 07:58 | रवि, 18 अप्रैल, 05:54 के बाद, 06:12 से पहले |
| रवि, 2 मई | वरूथिनीवैशाख · कृष्ण | शनि, 1 मई, 17:24 → रवि, 2 मई, 18:22 | सोम, 3 मई, 05:41 के बाद, 18:34 से पहले |
| रवि, 16 मई | मोहिनीवैशाख · शुक्ल | शनि, 15 मई, 16:48 → रवि, 16 मई, 15:43 | सोम, 17 मई, 05:33 के बाद, 14:58 से पहले |
| मंगल, 1 जून | अपराज्येष्ठ · कृष्ण | सोम, 31 मई, 08:32 → मंगल, 1 जून, 08:10 | बुध, 2 जून, 05:28 के बाद, 06:59 से पहले |
| सोम, 14 जून | निर्जलाज्येष्ठ · शुक्ल | सोम, 14 जून, 00:42 → मंगल, 15 जून, 00:38 | मंगल, 15 जून, 06:44 के बाद, 01:01 से पहले |
| बुध, 30 जून | योगिनीआषाढ़ · कृष्ण | मंगल, 29 जून, 20:34 → बुध, 30 जून, 19:01 | गुरु, 1 जुल॰, 05:32 के बाद, 16:45 से पहले |
| बुध, 14 जुलाई | देवशयनीआषाढ़ · शुक्ल | मंगल, 13 जुल॰, 10:39 → बुध, 14 जुल॰, 11:40 | गुरु, 15 जुल॰, 05:37 के बाद, 13:10 से पहले |
| गुरु, 29 जुलाई | कामिकाश्रावण · कृष्णक्षय तिथि | गुरु, 29 जुल॰, 06:04 → शुक्र, 30 जुल॰, 03:43 | शुक्र, 30 जुल॰, 08:59 के बाद, 00:48 से पहले |
| गुरु, 12 अगस्त | श्रावण पुत्रदाश्रावण · शुक्ल | बुध, 11 अग॰, 23:29 → शुक्र, 13 अग॰, 01:30 | शुक्र, 13 अग॰, 08:05 के बाद, 03:51 से पहले |
| शनि, 28 अगस्त | अजाभाद्रपद · कृष्ण | शुक्र, 27 अग॰, 13:55 → शनि, 28 अग॰, 11:12 | रवि, 29 अग॰, 05:58 के बाद, 08:06 से पहले |
| शनि, 11 सितंबर | परिवर्तिनीभाद्रपद · शुक्ल | शुक्र, 10 सित॰, 15:30 → शनि, 11 सित॰, 18:06 | रवि, 12 सित॰, 06:03 के बाद, 20:43 से पहले |
| रवि, 26 सितंबर | इंदिराआश्विन · कृष्ण | शनि, 25 सित॰, 21:01 → रवि, 26 सित॰, 18:19 | सोम, 27 सित॰, 06:09 के बाद, 15:25 से पहले |
| सोम, 11 अक्टूबर | पापांकुशाआश्विन · शुक्ल | रवि, 10 अक्टू॰, 10:11 → सोम, 11 अक्टू॰, 12:39 | मंगल, 12 अक्टू॰, 06:15 के बाद, 14:44 से पहले |
| सोम, 25 अक्टूबर | रमाकार्तिक · कृष्ण | सोम, 25 अक्टू॰, 04:10 → मंगल, 26 अक्टू॰, 01:52 | मंगल, 26 अक्टू॰, 07:17 के बाद, 23:33 से पहले |
| मंगल, 9 नवंबर | देवउठनीकार्तिक · शुक्लदो सूर्योदयों पर तिथि; पहला दिन लिया गया | मंगल, 9 नव॰, 06:05 → बुध, 10 नव॰, 07:41 | बुध, 10 नव॰, 13:55 के बाद, 08:37 से पहले |
| बुध, 24 नवंबर | उत्पन्नामार्गशीर्ष · कृष्ण | मंगल, 23 नव॰, 12:15 → बुध, 24 नव॰, 10:41 | गुरु, 25 नव॰, 06:42 के बाद, 09:21 से पहले |
| गुरु, 9 दिसंबर | मोक्षदामार्गशीर्ष · शुक्ल | गुरु, 9 दिस॰, 01:29 → शुक्र, 10 दिस॰, 01:50 | शुक्र, 10 दिस॰, 07:43 के बाद, 01:23 से पहले |
| गुरु, 23 दिसंबर | सफलापौष · कृष्ण | बुध, 22 दिस॰, 22:11 → गुरु, 23 दिस॰, 21:42 | शुक्र, 24 दिस॰, 07:00 के बाद, 21:38 से पहले |
तिथियाँ इस शहर के सूर्योदय पर उदया तिथि नियम (स्मार्त) से हैं। वैष्णव एकादशी एक दिन बाद हो सकती है।
Questions
दुबई में अगली एकादशी कब है?
रवि, 3 जनवरी (सफला)। तिथि शनि, 2 जन॰, 12:54 से रवि, 3 जन॰, 14:38 तक (दुबई का समय)।
दुबई में सफला का पारण कब करें?
पारण सोम, 4 जन॰, 07:04 के बाद, 16:46 से पहले।
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महत्व
एकादशी प्रत्येक पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को पड़ती है। वर्ष भर में यह लगभग 24 से 26 बार आती है, क्योंकि शुक्ल और कृष्ण — दोनों पक्षों की ग्यारहवीं तिथि इसी नाम से जानी जाती है। इस व्रत के अधिष्ठाता देवता भगवान विष्णु हैं। परंपरा में एकादशी को विष्णु-आराधना का दिन माना गया है, और इसीलिए यह व्रत करने वाले साधक उस दिन अपना ध्यान जप, श्रवण, कीर्तन और सात्त्विक आचरण पर केंद्रित रखते हैं।
यह व्रत कोई एक समुदाय तक सीमित नहीं है। भारत में तथा प्रवासी समुदायों में अनेक श्रद्धालु इसे नियमित रूप से रखते हैं, कुछ वर्ष में कुछ ही एकादशियाँ, और कुछ सभी। जो लोग व्रत का संकल्प लेते हैं, वे सामान्यतः अपनी शारीरिक स्थिति, आयु, कार्य-परिस्थिति और पारिवारिक परंपरा को ध्यान में रखते हुए इसका पालन करते हैं। ज्योतिष या धर्म-परंपरा में व्यक्तिगत निर्णय के लिए योग्य ज्योतिषी या अपने कुल-गुरु से परामर्श लेना उचित माना जाता है।
यहाँ दी गई तिथियाँ पंचांग के आधार पर परिकलित की जाती हैं और इस पृष्ठ पर इस वर्ष तथा आने वाले दो वर्षों के लिए दिखाई जाती हैं। किसी विशेष स्थान के लिए स्थानीय सूर्योदय और पंचांग-पद्धति के अनुसार समय में अंतर हो सकता है।
व्रत विधि — चरण दर चरण
1. संकल्प और तैयारी
व्रत से पहले दिन या उसी प्रातः संकल्प लेने की परंपरा है। संकल्प में यह भाव रखा जाता है कि व्रत विष्णु-स्मरण के लिए किया जा रहा है। घर में स्वच्छता, स्नान और शांत वातावरण व्रत के अनुकूल माने जाते हैं।
2. दिन का पालन
एकादशी के दिन अन्न का त्याग किया जाता है। कई साधक पूर्ण उपवास रखते हैं, कई फलाहार लेते हैं, और कई केवल अन्न छोड़कर दूध, फल या जल ग्रहण करते हैं। यह चयन व्यक्ति की शारीरिक स्थिति और परंपरा पर निर्भर करता है। दिन भर जप, ध्यान, विष्णु-सहस्रनाम या कीर्तन का अभ्यास इस व्रत का मुख्य अंग माना जाता है।
3. रात्रि-जागरण
कुछ परंपराओं में रात्रि-जागरण और भजन-कीर्तन का विधान है, तो कुछ में शांत चिंतन और स्वाध्याय को प्रधानता दी जाती है। दोनों में भाव एक ही है — मन को सांसारिक भोग से हटाकर स्मरण में लगाना।
4. पारण
व्रत का समापन अगले दिन प्रातः सूर्योदय के बाद, द्वादशी तिथि के भीतर पारण से होता है। पारण का अर्थ है व्रत तोड़ना, और परंपरा में इसे द्वादशी के भीतर ही करने पर बल दिया जाता है।
क्या खाएँ, क्या छोड़ें
एकादशी का मुख्य नियम है — अन्न का त्याग। इसके अतिरिक्त कई साधक कुछ और वस्तुओं से भी परहेज़ करते हैं, पर इनकी सूची उत्तर और दक्षिण, स्मार्त और वैष्णव परंपराओं में भिन्न-भिन्न है। इसलिए यहाँ कोई एक सूची थोपना उचित नहीं; अपने कुल या गुरु की परंपरा का पालन करना ही उपयुक्त माना जाता है।
- छोड़ें: अन्न, तथा वे पदार्थ जिन्हें आपकी परंपरा वर्जित मानती है।
- ले सकते हैं: जल, दूध, फल, और वे सात्त्विक पदार्थ जिनकी अनुमति आपकी परंपरा में हो।
- ध्यान रखें: उपवास की तीव्रता अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार रखें। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी निर्णय के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।
व्रत का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि संयम और स्मरण है। इसलिए अनेक परंपराओं में यह कहा जाता है कि जो साधक