नवग्रह · Guru (Jupiter)
गुरु
नवग्रह स्थिति
| ग्रह | राशि | अंश | नक्षत्र | गति | इस राशि में कब से | अगला राशि परिवर्तन |
|---|---|---|---|---|---|---|
| गुरु | कर्क | 29°19′ | Ashlesha | मार्गी | 2 जून 2026 | 31 अक्टू॰ 2026, 12:02→ सिंह |
आज दिल्ली में सूर्योदय पर निरयण (लाहिरी) स्थिति; समय IST में। राहु माध्य पात है; केतु सदा उसके सामने।
वक्री अवधि
- गुरु… – 11 मार्च 2026मिथुन
- गुरु13 दिस॰ 2026 – 13 अप्रैल 2027सिंह
गुरु: राशि परिवर्तन
- मिथुन → कर्क
- कर्क → मिथुन (वक्री)
- मिथुन → कर्क
- कर्क → सिंह
- सिंह → कर्क (वक्री)
- कर्क → सिंह
- सिंह → कन्या
- कन्या → सिंह (वक्री)
- सिंह → कन्या
- कन्या → तुला
- तुला → कन्या (वक्री)
- कन्या → तुला
| पाश्चात्य नाम | Jupiter |
|---|---|
| स्वराशि | धनु, मीन |
| उच्च | कर्क 5° |
| नीच | मकर 5° |
| स्वामित्व के नक्षत्र | पुनर्वसु, विशाखा, पूर्व भाद्रपद |
| विंशोत्तरी दशा | 16 वर्ष |
| मित्र | सूर्य, चंद्र, मंगल |
| शत्रु | बुध, शुक्र |
| सम | शनि |
| वार | गुरुवार |
| रत्न | पुखराज |
| बीज मंत्र | ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः |
| जप संख्या | 19,000 |
| कारकत्व | ज्ञान, संतान, धर्म, धन |
गुरु (बृहस्पति) — वैदिक ज्योतिष में
गुरु, जिन्हें पश्चिमी ज्योतिष में बृहस्पति (Jupiter) कहा जाता है, नवग्रहों में से एक हैं। वैदिक परंपरा में गुरु को ज्ञान, धर्म, संतान और धन का कारक माना जाता है। यह लेख एक संदर्भ-सामग्री है — इसमें गुरु के स्वरूप, उनके बलाबल, भावों में स्थिति, दशा तथा उपायों की सामान्य जानकारी दी गई है। व्यक्तिगत कुंडली का विश्लेषण सदैव योग्य ज्योतिषी से कराना उचित होता है।
कुंडली में भूमिका
गुरु को देवताओं का गुरु माना जाता है, इसलिए इनका संबंध विवेक, नैतिकता और शास्त्र-ज्ञान से जोड़ा जाता है। संक्षेप में, गुरु इन बातों के कारक माने जाते हैं:
- ज्ञान और विवेक
- संतान
- धर्म
- धन
गुरु के स्वामित्व वाले राशि-चक्र के भाग धनु (सगिटेरियस) और मीन (पिसीज़) हैं। इनके अधीन तीन नक्षत्र आते हैं — पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वा भाद्रपद। परंपरा में यह भी कहा जाता है कि जिनका चंद्रमा इन नक्षत्रों में होता है, उनका जीवन आरंभ गुरु महादशा में होता है।
गुरु का वार गुरुवार माना जाता है। मित्र ग्रहों में सूर्य, चंद्र और मंगल गिने जाते हैं; शत्रु ग्रहों में बुध और शुक्र; तथा शनि को तटस्थ (न्यूट्रल) कहा जाता है।
बलवान और निर्बल स्थिति
गुरु की उच्चता और नीचता की स्थिति इस प्रकार बताई जाती है:
- उच्च (Exaltation): कर्क 5°
- नीच (Debilitation): मकर 5°
जब गुरु अपनी स्वराशि धनु या मीन में, अथवा उच्च राशि कर्क में स्थित होते हैं, तो उनका स्वभाविक गुण अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त होता है। नीच राशि मकर में यह गुण दबा हुआ माना जाता है। यह मूल्यांकन केवल स्थिति का वर्णन है — इससे किसी व्यक्तिगत फल की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। पूर्ण आकलन के लिए ग्रह की दृष्टि, बल, अन्य ग्रहों के साथ युति और भाव-स्थिति सब देखे जाते हैं।
भावों के अनुसार संक्षिप्त प्रभाव
गुरु जिस भाव में बैठते हैं, परंपरा में उस भाव से जुड़े विषयों पर उनका प्रभाव पढ़ा जाता है। यहाँ भावों की संख्या के अनुसार सामान्य संकेत दिए गए हैं — यह सामान्य स्वरूप है, किसी व्यक्ति का निश्चित परिणाम नहीं।
- प्रथम भाव: व्यक्तित्व और आत्मबोध से जुड़े विषयों पर गुरु की छाया।
- द्वितीय भाव: वाणी, कुटुंब और संचय से संबंधित क्षेत्र।
- तृतीय भाव: पराक्रम, भाई-बहन और प्रयास से जुड़े विषय।
- चतुर्थ भाव: सुख, गृह और माता से संबंधित क्षेत्र।
- पंचम भाव: संतान, बुद्धि और सृजन से जुड़े विषय।
- षष्ठ भाव: सेवा, प्रतिस्पर्धा और बाधाओं से संबंधित क्षेत्र।
- सप्तम भाव: साझेदारी और संबंधों से जुड़े विषय।
- अष्टम भाव: गूढ़ विषयों और रूपांतरण से संबंधित क्षेत्र।
- नवम भाव: धर्म, गुरु-कृपा और भाग्य से जुड़े विषय।
- दशम भाव: कर्म और सामाजिक स्थान से संबंधित क्षेत्र।
- एकादश भाव: लाभ और इच्छापूर्ति से जुड़े विषय।
- द्वादश भाव: त्याग, विदेश और मोक्ष से संबंधित क्षेत्र।
यह ध्यान रहे कि भाव-फल सदैव अन्य ग्रहों की
प्रश्न
गुरु ग्रह किसका कारक है?
ज्ञान, संतान, धर्म, धन।
गुरु का मंत्र क्या है?
बीज मंत्र "ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः" है, जिसका परंपरा से 19,000 बार जप किया जाता है।
गुरु किन नक्षत्रों का स्वामी है?
पुनर्वसु, विशाखा और पूर्व भाद्रपद। जिनका जन्म इन नक्षत्रों में चंद्रमा के रहते होता है, उनका जीवन गुरु की महादशा से शुरू होता है।
गुरु की महादशा कितने वर्ष की होती है?
120 वर्ष के विंशोत्तरी चक्र में 16 वर्ष।
गुरु कहाँ उच्च और कहाँ नीच का होता है?
उच्च कर्क 5°, नीच मकर 5°।