नवग्रह · Chandra (Moon)
चंद्र
नवग्रह स्थिति
| ग्रह | राशि | अंश | नक्षत्र | गति | इस राशि में कब से | अगला राशि परिवर्तन |
|---|---|---|---|---|---|---|
| चंद्र | वृषभ | 5°44′ | Krittika | मार्गी | लगभग हर सवा दो दिन में राशि बदलता है; दैनिक पंचांग देखें | |
आज दिल्ली में सूर्योदय पर निरयण (लाहिरी) स्थिति; समय IST में। राहु माध्य पात है; केतु सदा उसके सामने।
| पाश्चात्य नाम | Moon |
|---|---|
| स्वराशि | कर्क |
| उच्च | वृषभ 3° |
| नीच | वृश्चिक 3° |
| स्वामित्व के नक्षत्र | रोहिणी, हस्त, श्रवण |
| विंशोत्तरी दशा | 10 वर्ष |
| मित्र | सूर्य, बुध |
| शत्रु | कोई नहीं |
| सम | मंगल, गुरु, शुक्र, शनि |
| वार | सोमवार |
| रत्न | मोती |
| बीज मंत्र | ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्राय नमः |
| जप संख्या | 11,000 |
| कारकत्व | मन, माता, भावनाएँ, तरल पदार्थ |
चंद्र (Moon) — वैदिक ज्योतिष में
वैदिक ज्योतिष के नौ ग्रहों में चंद्र का स्थान विशेष है। पाश्चात्य परंपरा में इसे Moon कहा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में चंद्र मन, माता, भावनाओं और द्रव पदार्थों का कारक माना गया है। जन्म कुंडली में चंद्र की स्थिति व्यक्ति के मानसिक स्वभाव और भावनात्मक प्रवृत्तियों को समझने का एक प्रमुख आधार है।
कुंडली में भूमिका
चंद्र का स्वामित्व कर्क (Cancer) राशि पर है। यह रोहिणी, हस्त और श्रवण नक्षत्रों का स्वामी है। जिन जातकों का जन्म इन नक्षत्रों में होता है, उनका जीवन चंद्र महादशा से आरंभ होता है। वैदिक परंपरा में चंद्र को मन का ग्रह कहा गया है, इसलिए कुंडली में इसकी स्थिति भावनात्मक संतुलन और मानसिक प्रवृत्तियों से जुड़ी मानी जाती है।
ग्रह मैत्री के अनुसार सूर्य और बुध चंद्र के मित्र हैं। चंद्र का कोई शत्रु ग्रह नहीं है। मंगल, गुरु, शुक्र और शनि चंद्र के लिए तटस्थ (सम) माने गए हैं। सप्ताह का दिन सोमवार चंद्र से संबंधित है।
बलवान और निर्बल स्थिति
चंद्र वृषभ राशि के 3 अंश पर उच्च का और वृश्चिक राशि के 3 अंश पर नीच का माना जाता है। उच्च स्थिति में चंद्र की शुभता बढ़ती मानी जाती है, और नीच स्थिति में इसका प्रभाव संतुलित करने की आवश्यकता बताई जाती है। यह मूल्यांकन केवल ग्रह की स्थिति का वर्णन है, किसी व्यक्तिगत फल का दावा नहीं।
चंद्र की बलवान या निर्बल स्थिति को समझने के लिए ज्योतिषी राशि, भाव, दृष्टि और अन्य ग्रहों के संबंध — इन सबका समग्र अध्ययन करते हैं। केवल एक बिंदु देखकर निष्कर्ष निकालना परंपरा के अनुकूल नहीं माना जाता।
भावों के अनुसार प्रभाव (संक्षेप में)
चंद्र जिस भाव में स्थित हो, उस भाव से जुड़े जीवन क्षेत्रों पर उसका प्रभाव पढ़ा जाता है। नीचे केवल सामान्य संकेत दिए गए हैं; व्यक्तिगत कुंडली में विवेचन भिन्न हो सकता है।
- प्रथम भाव: मन और व्यक्तित्व से जुड़े पक्षों पर चंद्र का प्रभाव।
- चतुर्थ भाव: माता और भावनात्मक आधार से संबंध।
- पंचम भाव: मन की रचनात्मक और भावनात्मक अभिव्यक्ति।
- सप्तम भाव: संबंधों में भावनात्मक पक्ष।
- दशम भाव: कार्यक्षेत्र में मन की भूमिका।
ये संकेत परंपरागत अर्थों पर आधारित हैं। किसी विशेष भाव-फल की घोषणा यहाँ नहीं की जा रही।
दशा प्रभाव
विंशोत्तरी दशा पद्धति में चंद्र की महादशा 10 वर्ष की होती है। यह 120 वर्ष के विंशोत्तरी चक्र का एक भाग है। जिन जातकों का जन्म रोहिणी, हस्त या श्रवण नक्षत्र में होता है, उनका जीवन चंद्र महादशा से आरंभ होता है।
चंद्र महादशा के भीतर अंतर्दशाएँ अन्य ग्रहों की क्रम-स्थिति के अनुसार चलती हैं। दशा-फल का आकलन चंद्र की कुंडली में स्थिति, उसके भाव और अन्य ग्रहों के संबंधों को देखकर किया जाता है। यह विवेचन व्यक्ति-विशेष पर निर्भर करता है, इसलिए सामान्य निष्कर्ष संभव नहीं।
उपाय, मंत्र और रत्न
चंद्र से जुड़े पारंपरिक उपायों में बीज मंत्र का जाप प्रमुख है।
- बीज मंत्र: ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्राय नमः
- जप संख्या: 11,000
- रत्न: मोती (Pearl)
- वार: सोमवार
मंत्र जाप की परंपरा
प्रश्न
चंद्र ग्रह किसका कारक है?
मन, माता, भावनाएँ, तरल पदार्थ।
चंद्र का मंत्र क्या है?
बीज मंत्र "ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्राय नमः" है, जिसका परंपरा से 11,000 बार जप किया जाता है।
चंद्र किन नक्षत्रों का स्वामी है?
रोहिणी, हस्त और श्रवण। जिनका जन्म इन नक्षत्रों में चंद्रमा के रहते होता है, उनका जीवन चंद्र की महादशा से शुरू होता है।
चंद्र की महादशा कितने वर्ष की होती है?
120 वर्ष के विंशोत्तरी चक्र में 10 वर्ष।
चंद्र कहाँ उच्च और कहाँ नीच का होता है?
उच्च वृषभ 3°, नीच वृश्चिक 3°।