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शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026
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नवग्रह · Shani (Saturn)

शनि

नवग्रह स्थिति

ग्रहराशिअंशनक्षत्रगतिइस राशि में कब सेअगला राशि परिवर्तन
शनिमीन15°10′Uttara Bhadrapadaवक्री29 मार्च 20253 जून 2027, 05:28→ मेष

आज दिल्ली में सूर्योदय पर निरयण (लाहिरी) स्थिति; समय IST में। राहु माध्य पात है; केतु सदा उसके सामने।

वक्री अवधि

शनि: राशि परिवर्तन

  1. मीन → मेष
  2. मेष → मीन (वक्री)
  3. मीन → मेष
  4. मेष → वृषभ
  5. वृषभ → मेष (वक्री)
पाश्चात्य नामSaturn
स्वराशिमकर, कुंभ
उच्चतुला 20°
नीचमेष 20°
स्वामित्व के नक्षत्रपुष्य, अनुराधा, उत्तर भाद्रपद
विंशोत्तरी दशा19 वर्ष
मित्रबुध, शुक्र
शत्रुसूर्य, चंद्र, मंगल
समगुरु
वारशनिवार
रत्ननीलम
बीज मंत्रॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
जप संख्या23,000
कारकत्वकर्म, अनुशासन, विलंब, आयु

शनि (सैटर्न) — वैदिक ज्योतिष में स्थान, स्वभाव और साधना

शनि नवग्रहों में एक हैं और वैदिक ज्योतिष में इन्हें कर्म, अनुशासन, विलंब और आयु का कारक माना जाता है। पाश्चात्य ज्योतिष में इन्हें सैटर्न कहा जाता है। शनि की गति धीमी होती है, इसलिए इनसे जुड़े फल प्रायः समय लेकर प्रकट होते हैं। यह लेख केवल परंपरागत संदर्भ के लिए है; किसी व्यक्तिगत कुंडली का मूल्यांकन योग्य ज्योतिषी से ही कराना उचित है।

कुंडली में भूमिका

शनि कर्म और अनुशासन के ग्रह हैं। जहाँ वे बैठते हैं, वहाँ जीवन साधना, धैर्य और परिश्रम से गढ़ा जाता है। परंपरा में शनि को विलंब देने वाला कहा गया है — अर्थात् फल तुरंत नहीं, परिश्रम के बाद मिलता है। साथ ही वे आयु और दीर्घकालिक संरचना से जुड़े हैं।

शनि के स्वामित्व वाले राशि-चिह्न मकर (Capricorn) और कुंभ (Aquarius) हैं। इनके अधीन नक्षत्र हैं — पुष्य, अनुराधा और उत्तरा भाद्रपद। जिनका चंद्र इन नक्षत्रों में होता है, वे जीवन की शुरुआत शनि महादशा में करते हैं।

विम्शोत्तरी दशा में शनि की अवधि 19 वर्ष की होती है, जो 120 वर्ष के चक्र का भाग है।

बलवान और निर्बल स्थिति

शनि उच्च के तुला 20° पर और नीच के मेष 20° पर माने जाते हैं। उच्च स्थिति में अनुशासन और धैर्य सहज रूप से फलदायी माने जाते हैं; नीच स्थिति में इन गुणों को अधिक साधना से विकसित करना पड़ता है। यह मूल्यांकन हमेशा पूरी कुंडली, दृष्टि और अन्य ग्रहों के संबंधों के साथ किया जाता है — केवल एक स्थान से निष्कर्ष नहीं निकाला जाता।

मैत्री संबंधों में शनि के मित्र बुध और शुक्र, शत्रु सूर्य, चंद्र और मंगल, तथा सम (न्यूट्रल) गुरु माने गए हैं। इन संबंधों का प्रयोग भी संपूर्ण कुंडली के संदर्भ में ही किया जाता है।

भावों के अनुसार संक्षिप्त संकेत

ये संकेत सामान्य प्रकृति के हैं; व्यक्तिगत फल हमेशा पूरी कुंडली पर निर्भर करते हैं।

दशा प्रभाव

शनि की महादशा 19 वर्ष की होती है, और इसके अंदर की अंतर्दशाएँ भी विचार में ली जाती हैं। परंपरा में शनि की दशा को परिश्रम, दायित्व और दीर्घकालिक निर्माण का समय कहा गया है — साथ ही यह धैर्य की परीक्षा भी है। किसी विशेष वर्ष या घटना का पूर्वानुमान इस लेख का विषय नहीं है; इसके लिए योग्य ज्योतिषी से परामर्श लें।

यह ध्यान रहे कि विभिन्न परंपराओं — उत्तर और दक्षिण भारतीय पद्धतियों, तथा अमांत और पूर्णिमांत मास-गणना — में कुछ बिंदुओं पर भिन्नता मिलती है। इसलिए एक ही नियम सब पर समान रूप से लागू नहीं माना जाता।

उपाय, मंत्र और रत्न

शनि का दिन शनिवार माना जाता है। परंपरागत उपायों में शनि की स्तुति, दान और सेवा का महत्व बताया गया है। बीज मंत्र है —

ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः

परंपरा में इस मंत्र का जप 23,000 की संख्या में कह

प्रश्न

शनि ग्रह किसका कारक है?

कर्म, अनुशासन, विलंब, आयु।

शनि का मंत्र क्या है?

बीज मंत्र "ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः" है, जिसका परंपरा से 23,000 बार जप किया जाता है।

शनि किन नक्षत्रों का स्वामी है?

पुष्य, अनुराधा और उत्तर भाद्रपद। जिनका जन्म इन नक्षत्रों में चंद्रमा के रहते होता है, उनका जीवन शनि की महादशा से शुरू होता है।

शनि की महादशा कितने वर्ष की होती है?

120 वर्ष के विंशोत्तरी चक्र में 19 वर्ष।

शनि कहाँ उच्च और कहाँ नीच का होता है?

उच्च तुला 20°, नीच मेष 20°।

यह भी देखें

नवग्रह में और