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मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026
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नवग्रह · Ketu (South node)

केतु

नवग्रह स्थिति

ग्रहराशिअंशनक्षत्रगतिइस राशि में कब सेअगला राशि परिवर्तन
केतुसिंह2°06′Maghaवक्री18 मई 20255 दिस॰ 2026, 22:32→ कर्क

आज दिल्ली में सूर्योदय पर निरयण (लाहिरी) स्थिति; समय IST में। राहु माध्य पात है; केतु सदा उसके सामने।

केतु: राशि परिवर्तन

  1. सिंह → कर्क
  2. कर्क → मिथुन
पाश्चात्य नामSouth node
स्वराशि— (वृश्चिक का सह-स्वामी)
उच्चवृश्चिक / धनु
नीचवृषभ / मिथुन
स्वामित्व के नक्षत्रअश्विनी, मघा, मूल
विंशोत्तरी दशा7 वर्ष
वारमंगलवार
रत्नलहसुनिया (वैदूर्य)
बीज मंत्रॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः
जप संख्या17,000
कारकत्वमोक्ष, वैराग्य, पूर्व कर्म, उपचार

केतु (दक्षिण नोड) — परिचय

वैदिक ज्योतिष में केतु को नवग्रहों में गिना जाता है। पाश्चात्य ज्योतिष में इसे दक्षिण नोड (South node) कहा जाता है। केतु का अपना कोई स्वतंत्र राशि-स्वामित्व नहीं माना जाता; परंपरा में इसे वृश्चिक (Scorpio) का सह-स्वामी कहा जाता है। कुछ विद्वान इसे वृश्चिक और कुछ धनु से जोड़कर देखते हैं — इन मतभेदों को परंपरा-भेद के रूप में स्वीकार किया जाता है।

केतु का स्वभाव रहस्य, वैराग्य और आंतरिक खोज से जुड़ा माना गया है। यह ग्रह मोक्ष, वैराग्य, पूर्व कर्म और उपचार का सूचक है। जहाँ राहु भोग और बाहरी विस्तार की ओर ले जाता है, वहाँ केतु भीतर की ओर, सार-ग्रहण और अनासक्ति की ओर संकेत करता है।

कुंडली में भूमिका

केतु को किसी भी भाव या राशि में स्थित देखकर ज्योतिषी यह समझने का प्रयास करते हैं कि जातक के जीवन में कहाँ अनासक्ति, अलगाव या गहन आंतरिक रुचि प्रकट हो सकती है। यह ग्रह उस क्षेत्र की ओर संकेत करता है जहाँ अनुभव पहले ही संचित माना जाता है, और इसलिए वहाँ सांसारिक महत्वाकांक्षा कम दिख सकती है।

केतु तीन नक्षत्रों का स्वामी माना जाता है — अश्विनी, मघा और मूल। जिन जातकों का चंद्रमा इन नक्षत्रों में होता है, वे अपना जीवन केतु महादशा से आरंभ करते हैं। यह बात किसी व्यक्ति के फल के बारे में नहीं, बल्कि दशा-क्रम की गणना के बारे में है।

इसकी साप्ताहिक दिन मंगलवार मानी जाती है।

बलवान बनाम निर्बल स्थिति

परंपरा में केतु की उच्च और नीच स्थिति इस प्रकार बताई जाती है:

उच्च स्थिति में केतु की वैराग्य-वृत्ति और आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्ति अधिक स्पष्ट मानी जाती है; नीच स्थिति में यही ऊर्जा भ्रम या अस्थिरता के रूप में प्रकट हो सकती है। यह मूल्यांकन सदैव पूरी कुंडली, दशा और गोचर के संदर्भ में किया जाता है — अकेले एक ग्रह से निष्कर्ष नहीं निकाला जाता। किसी व्यक्तिगत कुंडली के लिए योग्य ज्योतिषी से परामर्श करना उचित माना जाता है।

भाव के अनुसार संक्षिप्त प्रभाव

भाव-फल का वर्णन सामान्य प्रवृत्ति के रूप में किया जाता है, न कि किसी निश्चित घटना के रूप में:

प्रत्येक भाव का विस्तृत फल राशि, दृष्टि, युति और दशा पर निर्भर करता है।

दशा प्रभाव

विंशोत्तरी पद्धति के 120 वर्ष के चक्र में केतु महादशा 7 वर्ष की मानी जाती है। इस अवधि को सामान्यतः आंतरिक मोड़, पुनर्मूल्यांकन और सरलता की ओर झुकाव के काल के रूप में देखा जाता है। अंतर्दशा और प्रत्यंतर दशा के साथ मिलकर यह काल और सूक्ष्म हो जाता है।

किसी विशेष व्यक्ति के लिए इस दशा का फल उसकी पूरी कुंडली पर निर्भर करता है, इसलिए सामान्य नियम को व्यक्तिगत भविष्यवाणी न मानें।

उपाय, मंत्र और रत्न

केतु के लिए परंपरा में बीज मंत्र बताया गया है:

ॐ स्रां

प्रश्न

केतु ग्रह किसका कारक है?

मोक्ष, वैराग्य, पूर्व कर्म, उपचार।

केतु का मंत्र क्या है?

बीज मंत्र "ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः" है, जिसका परंपरा से 17,000 बार जप किया जाता है।

केतु किन नक्षत्रों का स्वामी है?

अश्विनी, मघा और मूल। जिनका जन्म इन नक्षत्रों में चंद्रमा के रहते होता है, उनका जीवन केतु की महादशा से शुरू होता है।

केतु की महादशा कितने वर्ष की होती है?

120 वर्ष के विंशोत्तरी चक्र में 7 वर्ष।

केतु कहाँ उच्च और कहाँ नीच का होता है?

उच्च वृश्चिक / धनु, नीच वृषभ / मिथुन।

यह भी देखें

नवग्रह में और