27 नक्षत्र · Mula
मूल
| क्रम | 27 में से 19 |
|---|---|
| स्वामी ग्रह | केतु |
| देवता | निऋति |
| प्रतीक | जड़ों का गुच्छा |
| गण | राक्षस |
| योनि | श्वान (नर) |
| नाड़ी | आदि |
| राशि-चक्र में विस्तार | धनु 0°–13°20′ |
| राशि | धनु |
| पद नवांश | 1: मेष, 2: वृषभ, 3: मिथुन, 4: कर्क |
| नामाक्षर | ये, यो, भा, भी |
| विंशोत्तरी दशा | केतु महादशा, 7 वर्ष |
मूल नक्षत्र: अर्थ और प्रतीक
मूल नक्षत्र 27 नक्षत्रों में 19वाँ नक्षत्र है। इसका स्वामी केतु है और अधिष्ठात्री देवता निरृति हैं। इसका प्रतीक जड़ों का गुच्छा है। ज्योतिष परंपरा में मूल का अर्थ है—जड़, आधार, वह गहराई जिससे सब कुछ पोषित होता है। जड़ें दिखती नहीं, परंतु वृक्ष का पूरा जीवन उन्हीं पर टिका होता है; यही मूल नक्षत्र का मर्म है।
आधारभूत तथ्य
- क्रम: 27 में से 19वाँ नक्षत्र
- स्वामी ग्रह: केतु
- देवता: निरृति
- प्रतीक: जड़ों का गुच्छा
- गण: राक्षस
- योनि: कुत्ता (पुरुष)
- नाड़ी: आदि
- राशि: धनु (सगिटेरियस)
- नक्षत्र विस्तार: धनु 0°–13°20′
- पद नवांश: 1—मेष, 2—वृषभ, 3—मिथुन, 4—कर्क
- नाम अक्षर: ये, यो, भ, भी
- विंशोत्तरी दशा: केतु महादशा, 7 वर्ष
राशि और अंश की गणना सायन (उष्णकटिबंधीय) नहीं, बल्कि निरयन (सिडेरियल) पद्धति से की जाती है; अधिकांश भारतीय पंचांग लाहिरी अयनांश का प्रयोग करते हैं। विभिन्न परंपराओं में गणना की बारीकियाँ भिन्न हो सकती हैं, इसलिए अपनी जन्म-कुंडली के लिए योग्य ज्योतिषी से पुष्टि करना उचित रहता है।
मूल नक्षत्र में जन्मे व्यक्तियों का स्वभाव
मूल के प्रतीक और स्वामी को देखते हुए इस नक्षत्र में जन्मे व्यक्तियों में गहराई, खोजबीन और जड़ तक पहुँचने की प्रवृत्ति देखी जाती है। केतु का स्वभाव विच्छेदन और वैराग्य का है—यह जो पुराना, ऊपरी या असार हो, उसे हटाकर मूल तत्व तक पहुँचने की प्रेरणा देता है। निरृति देवता का संबंध विघटन और पुनर्स्थापन से जुड़ा है, अतः ऐसे जातक अक्सर जीवन में ऐसे मोड़ों से गुजरते हैं जहाँ पुरानी संरचना टूटती है और नई दिशा बनती है।
गण राक्षस होने से इनमें तीव्रता, स्पष्टवादिता और परिस्थिति को सीधे देखने का साहस दिखता है। ये प्रायः प्रश्न पूछने वाले, अनुसंधानप्रिय और सतही उत्तरों से असंतुष्ट रहने वाले होते हैं। यह वर्णन स्वभाव-प्रवृत्ति के रूप में पढ़ा जाए, किसी व्यक्ति के जीवन के परिणाम की भविष्यवाणी के रूप में नहीं; पूरी कुंडली का आकलन ही अंतिम आधार होता है।
चार पद
प्रत्येक नक्षत्र चार पदों में विभाजित होता है, और मूल के पदों का नवांश इस प्रकार है:
- प्रथम पद — नवांश मेष; नाम अक्षर ये
- द्वितीय पद — नवांश वृषभ; नाम अक्षर यो
- तृतीय पद — नवांश मिथुन; नाम अक्षर भ
- चतुर्थ पद — नवांश कर्क; नाम अक्षर भी
परंपरा में शिशु के नामकरण के लिए जन्म-पद का अक्षर चुना जाता है। चारों पद एक ही नक्षत्र के भीतर हैं, फिर भी नवांश बदलने से स्वभाव की बारीक छटाएँ भिन्न मानी जाती हैं।
करियर और धन
मूल नक्षत्र की जड़ों वाली प्रकृति अनुसंधान, गहन अध्ययन, चिकित्सा-विज्ञान, ज्योतिष, दर्शन, खनन, कृषि, वन-संपदा और उन कार्यों की ओर संकेत करती है जहाँ मूल कारण तक पहुँचना आवश्यक हो। केतु की छाया वाले जातक अक्सर उन क्षेत्रों में सफल होते हैं जहाँ स्वतंत्र चिंतन और अपरंपरागत दृष्टि की माँग होती है।
यहाँ यह स्मरण रहे कि ज्योतिष स्वभाव और प्रवृत्ति का संकेत देता है, आय
प्रश्न
मूल नक्षत्र का स्वामी कौन है?
मूल का स्वामी ग्रह केतु है; इसके अधिष्ठाता देवता निऋति हैं।
मूल नक्षत्र किस राशि में आता है?
मूल निरयण राशि-चक्र (लाहिरी अयनांश) में धनु 0°–13°20′ तक फैला है।
मूल नक्षत्र के नामाक्षर क्या हैं?
चारों पदों के पारंपरिक नामाक्षर ये, यो, भा, भी हैं।
मूल में जन्म लेने वाले की दशा किससे शुरू होती है?
विंशोत्तरी दशा केतु महादशा (7 वर्ष पूर्ण) से शुरू होती है; जन्म के समय शेष अवधि इस पर निर्भर है कि चंद्रमा मूल में कितना आगे बढ़ चुका है।
मूल का गण, योनि और नाड़ी क्या है?
गण राक्षस, योनि श्वान (नर), नाड़ी आदि। ये तीनों अष्टकूट कुंडली मिलान में काम आते हैं।
संबंधित
यह भी देखें
27 नक्षत्र में और
- अनुराधाAnuradha
- आश्लेषाAshlesha
- आर्द्राArdra
- अश्विनीAshwini
- भरणीBharani
- चित्राChitra
- धनिष्ठाDhanishta
- ज्येष्ठाJyeshtha
- कृत्तिकाKrittika
- हस्तHasta
- मघाMagha
- मृगशिराMrigashira
- पुनर्वसुPunarvasu
- पूर्वाषाढ़ाPurva Ashadha
- पूर्व भाद्रपदPurva Bhadrapada
- पुष्यPushya
- रेवतीRevati
- रोहिणीRohini
- पूर्व फाल्गुनीPurva Phalguni
- शतभिषाShatabhisha
- श्रवणShravana
- स्वातिSwati
- उत्तराषाढ़ाUttara Ashadha
- उत्तर भाद्रपदUttara Bhadrapada
- उत्तर फाल्गुनीUttara Phalguni
- विशाखाVishakha