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27 नक्षत्र · Shatabhisha

शतभिषा

क्रम27 में से 24
स्वामी ग्रहराहु
देवतावरुण
प्रतीकरिक्त वृत्त / सौ चिकित्सक
गणराक्षस
योनिअश्व (मादा)
नाड़ीआदि
राशि-चक्र में विस्तारकुंभ 6°40′–20°
राशिकुंभ
पद नवांश1: धनु, 2: मकर, 3: कुंभ, 4: मीन
नामाक्षरगो, सा, सी, सू
विंशोत्तरी दशाराहु महादशा, 18 वर्ष

शतभिषा नक्षत्र — परिचय

शतभिषा सत्ताईस नक्षत्रों में 24वाँ नक्षत्र है। इसके स्वामी ग्रह राहु हैं और अधिष्ठाता देवता वरुण हैं। इसका प्रतीक खाली वृत्त / सौ चिकित्सक माना जाता है। यह नक्षत्र कुम्भ (वृष) राशि में कुम्भ 6°40′ से 20° तक फैला हुआ है। गण राक्षस, योनि अश्व (स्त्री) और नाड़ी आदि है — ये तीनों अष्टकूट कुण्डली मिलान में प्रयुक्त होते हैं। नाम-अक्षर गो, सा, सी, सु हैं, और विंशोत्तरी दशा राहु महादशा (18 वर्ष) से आरम्भ होती है; जन्म के समय शेष दशा इस पर निर्भर करती है कि चन्द्रमा शतभिषा में कितनी दूर तक चल चुका है।

अर्थ और प्रतीकात्मकता

शतभिषा का सम्बन्ध वरुण से है — जल, वर्षा, समुद्र और ऋत के अधिष्ठाता। इसी कारण इस नक्षत्र में गूढ़ता, अनुसंधान और उपचार की भावना जुड़ी मानी जाती है। प्रतीक “खाली वृत्त” सुझाता है कि बाहर से रिक्त दिखने वाले भीतर बहुत कुछ समेटे हो सकते हैं। “सौ चिकित्सक” का भाव औषधि और सेवा की परम्परा की ओर संकेत करता है। यहाँ कोई निश्चित फल नहीं बताया जाता — ये केवल परम्परागत संकेत हैं जिन्हें ज्योतिषीय अध्ययन में सन्दर्भ की तरह पढ़ा जाता है।

इस नक्षत्र में जन्मे व्यक्तियों का स्वभाव

परम्परागत वर्णन में शतभिषा-जन्मे लोगों को एकान्तप्रिय, चिन्तनशील और भीतर की ओर झुकाव रखने वाला माना जाता है। राहु के स्वामित्व के कारण नए-नए विषयों, तकनीक, अनुसंधान और अपरिचित क्षेत्रों के प्रति जिज्ञासा स्वाभाविक बताई जाती है। वरुण से जुड़े होने के कारण जल, वर्षा, समुद्र या तरल पदार्थों से जुड़े प्रसंग भी इनके जीवन में विषय बन सकते हैं। गण राक्षस होने से कुछ परम्पराएँ इन्हें दृढ़, स्वतंत्र और कभी-कभी रहस्यमय स्वभाव का मानती हैं। यह सब व्यक्ति-विशेष की पूरी कुण्डली देखे बिना निश्चित नहीं किया जा सकता।

चार पाद

प्रत्येक नक्षत्र के चार पाद होते हैं, और शतभिषा के पाद-नवांश इस प्रकार दिए गए हैं:

नाम-अक्षर भी इसी क्रम से जुड़े हैं — गो, सा, सी, सु। पाद-नवांश का उपयोग शास्त्रों में सूक्ष्म अध्ययन के लिए किया जाता है, पर इससे किसी व्यक्ति के लिए कोई फल पहले से तय नहीं होता।

व्यवसाय और धन

शास्त्रीय साहित्य में शतभिषा को अनुसंधान, चिकित्सा-सेवा, तकनीक, जल-सम्बन्धी कार्य और एकान्त में किए जाने वाले कार्यों से जोड़कर देखा जाता है। राहु के स्वामित्व के कारण नवीन क्षेत्रों में प्रवेश की प्रवृत्ति बताई जाती है। यह ध्यान रहे कि ये केवल परम्परागत संकेत हैं; धन और व्यवसाय का वास्तविक मूल्यांकन सम्पूर्ण कुण्डली, दशा और ग्रह-स्थिति के आधार पर योग्य ज्योतिषी द्वारा ही किया जाना चाहिए।

प्रेम, विवाह और अनुकूलता

विवाह-मिलान में शतभिषा का गण राक्षस, योनि अश्व (स्त्री) और नाड़ी आदि प्रयुक्त होती है। ये तीनों अष्टकूट के आठ कूटों में सम्मिलित हैं और वर-वधू दोनों की कुण्डली के साथ मिलाकर देखे जाते हैं। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि विवाह का कोई निश्च

प्रश्न

शतभिषा नक्षत्र का स्वामी कौन है?

शतभिषा का स्वामी ग्रह राहु है; इसके अधिष्ठाता देवता वरुण हैं।

शतभिषा नक्षत्र किस राशि में आता है?

शतभिषा निरयण राशि-चक्र (लाहिरी अयनांश) में कुंभ 6°40′–20° तक फैला है।

शतभिषा नक्षत्र के नामाक्षर क्या हैं?

चारों पदों के पारंपरिक नामाक्षर गो, सा, सी, सू हैं।

शतभिषा में जन्म लेने वाले की दशा किससे शुरू होती है?

विंशोत्तरी दशा राहु महादशा (18 वर्ष पूर्ण) से शुरू होती है; जन्म के समय शेष अवधि इस पर निर्भर है कि चंद्रमा शतभिषा में कितना आगे बढ़ चुका है।

शतभिषा का गण, योनि और नाड़ी क्या है?

गण राक्षस, योनि अश्व (मादा), नाड़ी आदि। ये तीनों अष्टकूट कुंडली मिलान में काम आते हैं।

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