27 नक्षत्र · Ashlesha
आश्लेषा
| क्रम | 27 में से 9 |
|---|---|
| स्वामी ग्रह | बुध |
| देवता | नाग |
| प्रतीक | कुंडली मारे सर्प |
| गण | राक्षस |
| योनि | मार्जार (नर) |
| नाड़ी | अंत्य |
| राशि-चक्र में विस्तार | कर्क 16°40′–30° |
| राशि | कर्क |
| पद नवांश | 1: धनु, 2: मकर, 3: कुंभ, 4: मीन |
| नामाक्षर | डी, डू, डे, डो |
| विंशोत्तरी दशा | बुध महादशा, 17 वर्ष |
आश्लेषा नक्षत्र — स्वामी, देवता, विशेषताएँ, पाद और अनुकूलता
आश्लेषा 27 नक्षत्रों में नौवाँ नक्षत्र है। यदि आपने अभी-अभी अपना जन्म नक्षत्र जाना है और वह आश्लेषा निकला है, तो यह संदर्भ-पृष्ठ आपके लिए है। यहाँ दिए गए तथ्य परंपरागत ज्योतिष के आधार पर हैं, और व्यक्तिगत फलादेश के लिए योग्य ज्योतिषी से परामर्श करना उचित माना जाता है।
अर्थ और प्रतीक
आश्लेषा का अर्थ है "आलिंगन" या "लिपटना"। इसका प्रतीक कुंडलित सर्प (coiled serpent) है, और इसके अधिष्ठाता देवता नाग हैं। इसका स्वामी ग्रह बुध (Mercury) है। गण राक्षस, योनि बिल्ली (नर) और नाड़ी अन्त्य है। नक्षत्र का विस्तार कर्क राशि के 16°40′ से 30° तक माना जाता है, अर्थात् यह पूरी तरह कर्क (Kark) राशि में स्थित है।
इस नक्षत्र में जन्मे लोगों का स्वभाव
परंपरागत वर्णन के अनुसार आश्लेषा में जन्मे जातक गहन, सतर्क और भीतर की ओर झुकाव रखने वाले माने जाते हैं। सर्प का प्रतीक धैर्य, संयम और स्थिति को भाँपने की क्षमता की ओर संकेत करता है। बुध के स्वामित्व के कारण बुद्धि, वाणी और विश्लेषण-शक्ति पर बल रहता है। ये विवरण सामान्य प्रवृत्तियों के रूप में पढ़े जाएँ, न कि किसी व्यक्ति के भविष्य के निर्णय के रूप में — कुंडली का समग्र अध्ययन ही अंतिम आधार होता है।
चार पाद
आश्लेषा के चारों पाद नवांश के अनुसार इस प्रकार हैं:
- पहला पाद — धनु (Sagittarius)
- दूसरा पाद — मकर (Capricorn)
- तीसरा पाद — कुंभ (Aquarius)
- चौथा पाद — मीन (Pisces)
नामकरण की पारंपरिक अक्षर इन चारों पादों के लिए क्रमशः दी, दू, दे, दो माने गए हैं।
करियर और धन
बुध के स्वामित्व के कारण संचार, लेखन, गणना, विश्लेषण और सूक्ष्म निरीक्षण से जुड़े कार्यों की ओर संकेत देखा जाता है। यह केवल प्रवृत्ति-वर्णन है; किसी विशेष व्यवसाय, आय या लाभ की गारंटी नहीं। करियर संबंधी निर्णय अपनी योग्यता, शिक्षा और परिस्थिति के आधार पर लें।
प्रेम, विवाह और अनुकूलता
अष्टकूट कुंडली मिलान में गण, योनि और नाड़ी का उपयोग होता है। आश्लेषा के लिए ये क्रमशः राक्षस, बिल्ली (नर) और अन्त्य हैं। ये तीनों मिलान के कई बिंदुओं में से कुछ हैं; पूरा मिलान अन्य कूटों के साथ ही देखा जाता है। विवाह संबंधी निर्णय केवल एक नक्षत्र के आधार पर नहीं किए जाते — दोनों कुंडलियों का सम्पूर्ण परीक्षण आवश्यक माना जाता है।
स्वास्थ्य प्रवृत्तियाँ
ज्योतिष में नक्षत्रों का स्वास्थ्य से जोड़कर वर्णन परंपरा में मिलता है, पर यह चिकित्सकीय निदान या सलाह नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी चिंता के लिए योग्य चिकित्सक से ही परामर्श लें।
उपाय और मंत्र
परंपरा में नक्षत्र-स्वामी बुध की शांति के लिए सामान्य उपाय बताए जाते हैं, और नाग देवता का स्मरण किया जाता है। इन्हें श्रद्धा और संतुलन के साधन के रूप में देखा जाता है, किसी परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं। व्यक्तिगत कुंडली के अनुसार उपाय चुनने के लिए योग्य ज्योतिषी से परामर्श करें।
विंशोत्तरी दशा
आश्लेषा में जन्म लेने वाले जातक की विंशोत्तरी दशा बुध महादशा से आरंभ होती है, जिसकी पूर्ण अवधि 17 वर्ष मानी जाती है। जन्म के समय कितनी दशा शेष रहती है, यह इस पर निर्भर करता है कि चंद्रमा आश्लेषा में कितनी द
प्रश्न
आश्लेषा नक्षत्र का स्वामी कौन है?
आश्लेषा का स्वामी ग्रह बुध है; इसके अधिष्ठाता देवता नाग हैं।
आश्लेषा नक्षत्र किस राशि में आता है?
आश्लेषा निरयण राशि-चक्र (लाहिरी अयनांश) में कर्क 16°40′–30° तक फैला है।
आश्लेषा नक्षत्र के नामाक्षर क्या हैं?
चारों पदों के पारंपरिक नामाक्षर डी, डू, डे, डो हैं।
आश्लेषा में जन्म लेने वाले की दशा किससे शुरू होती है?
विंशोत्तरी दशा बुध महादशा (17 वर्ष पूर्ण) से शुरू होती है; जन्म के समय शेष अवधि इस पर निर्भर है कि चंद्रमा आश्लेषा में कितना आगे बढ़ चुका है।
आश्लेषा का गण, योनि और नाड़ी क्या है?
गण राक्षस, योनि मार्जार (नर), नाड़ी अंत्य। ये तीनों अष्टकूट कुंडली मिलान में काम आते हैं।
संबंधित
यह भी देखें
27 नक्षत्र में और
- अनुराधाAnuradha
- आर्द्राArdra
- अश्विनीAshwini
- भरणीBharani
- चित्राChitra
- धनिष्ठाDhanishta
- ज्येष्ठाJyeshtha
- कृत्तिकाKrittika
- हस्तHasta
- मघाMagha
- मृगशिराMrigashira
- मूलMula
- पुनर्वसुPunarvasu
- पूर्वाषाढ़ाPurva Ashadha
- पूर्व भाद्रपदPurva Bhadrapada
- पुष्यPushya
- रेवतीRevati
- रोहिणीRohini
- पूर्व फाल्गुनीPurva Phalguni
- शतभिषाShatabhisha
- श्रवणShravana
- स्वातिSwati
- उत्तराषाढ़ाUttara Ashadha
- उत्तर भाद्रपदUttara Bhadrapada
- उत्तर फाल्गुनीUttara Phalguni
- विशाखाVishakha