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27 नक्षत्र · Mrigashira

मृगशिरा

क्रम27 में से 5
स्वामी ग्रहमंगल
देवतासोम
प्रतीकमृग का सिर
गणदेव
योनिसर्प (मादा)
नाड़ीमध्य
राशि-चक्र में विस्तारवृषभ 23°20′–मिथुन 6°40′
राशिवृषभ / मिथुन
पद नवांश1: सिंह, 2: कन्या, 3: तुला, 4: वृश्चिक
नामाक्षरवे, वो, का, की
विंशोत्तरी दशामंगल महादशा, 7 वर्ष

मृगशिरा नक्षत्र — स्वामी, देवता, विशेषताएँ, पाद और अनुकूलता

यदि आपने अभी-अभी अपना जन्म नक्षत्र जाना है और वह मृगशिरा निकला है, तो यह लेख आपके लिए एक शांत और व्यवस्थित संदर्भ है। मृगशिरा 27 नक्षत्रों में पाँचवाँ नक्षत्र है। इसके स्वामी ग्रह मंगल (Mangal) हैं और अधिष्ठाता देवता सोम हैं। इसका प्रतीक मृग का सिर (हिरण का मस्तक) माना जाता है।

अर्थ और प्रतीक

मृगशिरा का अर्थ हिरण के सिर से जुड़ा है — हिरण का स्वभाव चौकन्ना, कोमल और खोजी होता है। सोम देवता रस, सौम्यता और पोषण से जुड़े माने जाते हैं। यही संकेत मृगशिरा के स्वभाव में भी दिखता है: एक ओर मंगल की ऊर्जा और गति, दूसरी ओर सोम की सौम्यता और जिज्ञासा।

ज्योतिष की गणना में इस नक्षत्र का विस्तार वृषभ 23°20′ से मिथुन 6°40′ तक माना जाता है (लाहिरी अयनांश के अनुसार)। इस प्रकार यह दो राशियों — वृषभ (Taurus) और मिथुन (Gemini) — में फैला हुआ है।

इस नक्षत्र में जन्मे लोगों का स्वभाव

परंपरागत वर्णन में मृगशिरा के जातक जिज्ञासु, तेज़ बुद्धि वाले और खोजी प्रवृत्ति के माने जाते हैं। मंगल के स्वामित्व से इनमें उत्साह और कार्य-प्रवृत्ति देखी जाती है, जबकि सोम की उपस्थिति सौम्य और संवेदनशील पक्ष जोड़ती है। ध्यान रहे — ये सामान्य प्रवृत्तियाँ हैं, किसी व्यक्ति विशेष का निश्चित फल नहीं। पूरी कुंडली के अन्य ग्रह-भाव इन्हें प्रभावित करते हैं।

चार पाद

मृगशिरा के चारों पादों का नवांश इस प्रकार बताया जाता है:

परंपरा में नामकरण इन्हीं अक्षरों से किया जाता है। किसी पाद का नवांश उसके स्वामी ग्रह के अनुसार रंग लेता है — यह अध्ययन का विषय है, कोई भविष्यवाणी नहीं।

करियर और धन

मंगल के स्वामित्व और मिथुन-वृषभ के मेल को देखते हुए ज्योतिषीय परंपरा में मृगशिरा को गति, संचार, खोज और कौशल से जोड़कर देखा जाता है। यह केवल सामान्य संकेत है। किसी भी व्यक्ति के करियर या आर्थिक निर्णय के लिए अपनी पूरी जन्मकुंडली किसी योग्य ज्योतिषी से देखवाना उचित रहता है। यहाँ कोई आर्थिक परिणाम का दावा नहीं किया जा रहा।

प्रेम, विवाह और अनुकूलता

विवाह मिलान में मृगशिरा के तीन गुण प्रमुखता से प्रयुक्त होते हैं: गण देव, योनि सर्प (स्त्री) और नाड़ी मध्य। अष्टकूट मिलान में इनका उपयोग होता है। साथ ही, कोई भी मिलान केवल एक नक्षत्र से तय नहीं होता — पूरी कुंडली, दशा और अन्य कारकों का अध्ययन आवश्यक है। भिन्न परंपराओं में मिलान की विधियाँ थोड़ी भिन्न हो सकती हैं; इसलिए अपनी परंपरा के

प्रश्न

मृगशिरा नक्षत्र का स्वामी कौन है?

मृगशिरा का स्वामी ग्रह मंगल है; इसके अधिष्ठाता देवता सोम हैं।

मृगशिरा नक्षत्र किस राशि में आता है?

मृगशिरा निरयण राशि-चक्र (लाहिरी अयनांश) में वृषभ 23°20′–मिथुन 6°40′ तक फैला है।

मृगशिरा नक्षत्र के नामाक्षर क्या हैं?

चारों पदों के पारंपरिक नामाक्षर वे, वो, का, की हैं।

मृगशिरा में जन्म लेने वाले की दशा किससे शुरू होती है?

विंशोत्तरी दशा मंगल महादशा (7 वर्ष पूर्ण) से शुरू होती है; जन्म के समय शेष अवधि इस पर निर्भर है कि चंद्रमा मृगशिरा में कितना आगे बढ़ चुका है।

मृगशिरा का गण, योनि और नाड़ी क्या है?

गण देव, योनि सर्प (मादा), नाड़ी मध्य। ये तीनों अष्टकूट कुंडली मिलान में काम आते हैं।

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