व्रत और उपवास · Parivartini Ekadashi
परिवर्तिनी एकादशी
| कब | भाद्रपद शुक्ल एकादशी |
|---|---|
| देवता | विष्णु |
| विधि | अन्न का त्याग; अगली सुबह सूर्योदय के बाद, द्वादशी के भीतर पारण |
परिवर्तिनी एकादशी — अर्थ और महत्व
परिवर्तिनी एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित एक व्रत है, जो भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। परंपरा में इसे "परिवर्तिनी" कहा गया है — अर्थात जो परिवर्तन या पलटने से जुड़ी है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु योग निद्रा से जागते हैं और शयन से करवट लेते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी या पद्मा एकादशी भी कहा जाता है। यह व्रत उस भक्त के लिए है जो एकादशी की साधना को नियमित रूप से निभाता है और भगवान विष्णु की कृपा का स्मरण करता है।
यहाँ यह स्मरण रहे कि एकादशी की तिथि, उसका आरंभ और समापन, तथा परान का समय स्थानीय पंचांग के अनुसार भिन्न हो सकता है। इस पृष्ठ पर इस वर्ष और आगामी वर्षों की तिथियाँ पंचांग से गणना करके दी गई हैं — कृपया उन्हीं को देखें और अपने नगर के पंचांग से मिलान कर लें।
व्रत विधि — चरण दर चरण
परिवर्तिनी एकादशी का व्रत सरल है, पर नियम का पालन आवश्यक है। नीचे दी गई विधि परंपरा के अनुसार है:
- पूर्व संध्या: दशमी की रात को हल्का भोजन करें और मन को व्रत के लिए तैयार करें। कई परिवार इस दिन अन्न का त्याग कर देते हैं।
- स्नान और संकल्प: एकादशी के दिन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प लें।
- पूजन: विष्णु जी की मूर्ति या चित्र के समक्ष दीप, धूप, पुष्प और तुलसी अर्पित करें। विष्णु सहस्रनाम या "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जप करें।
- दिन का पालन: दिन भर अन्न का त्याग करें। जल, दूध, फल अथवा फलाहार ग्रहण किया जा सकता है — अपनी शारीरिक स्थिति और परिवार की परंपरा के अनुसार।
- रात्रि जागरण: जो सामर्थ्य रखते हैं वे रात्रि में कीर्तन, पाठ या जागरण करते हैं। यह अनिवार्य नहीं, परंपरा में श्रेष्ठ माना गया है।
- पारण: अगले दिन सूर्योदय के बाद, द्वादशी तिथि के भीतर पारण करें।
यदि स्वास्थ्य या अन्य कारणवश पूर्ण व्रत संभव नहीं है, तो अन्न-त्याग मात्र भी परंपरा में स्वीकार्य माना जाता है। किसी भी निर्णय से पहले अपने कुल-परंपरा या योग्य ज्योतिषी से परामर्श करें।
क्या खाएँ और क्या त्यागें
एकादशी व्रत का मूल नियम है — अन्न का त्याग। इसके अतिरिक्त कुछ वस्तुएँ परंपरा में वर्जित मानी गई हैं:
- त्यागें: चावल, गेहूँ, दालें, अनाज से बने सभी पदार्थ, तथा प्याज, लहसुन और मांस-मदिरा।
- ग्रहण कर सकते हैं: जल, दूध, दही, फल, साबूदाना, सिंघाड़ा, राजगीरा और मखाना — स्थानीय परंपरा के अनुसार।
- विशेष: तुलसी दल का महत्व विष्णु पूजन में विशेष है। कई श्रद्धालु एकादशी के दिन तुलसी का सेवन नहीं करते, केवल अर्पित करते हैं — यह परंपरा भिन्न-भिन्न है।
उत्तर और दक्षिण भारत, तथा स्मार्त और वैष्णव परंपराओं में खान-पान के नियमों में कुछ अंतर देखने को मिलता है। अपने परिवार या संप्रदाय की परंपरा का पालन करना उचित है।
पारण के नियम
पारण का अर्थ है — व्रत तोड़ना। इसका समय पंचांग से निर्धारित होता है:
- पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है।
- यह द्वादशी तिथि के भीतर होना चाहिए — द्वादशी समाप्त
प्रश्न
अगला परिवर्तिनी एकादशी कब है?
इस वर्ष और अगले दो वर्षों की तिथियाँ पंचांग से गणना करके इसी पृष्ठ पर दी गई हैं।
परिवर्तिनी एकादशी कैसे रखा जाता है?
अन्न का त्याग; अगली सुबह सूर्योदय के बाद, द्वादशी के भीतर पारण।
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