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हिंदू त्योहार · Dattatreya Jayanti

दत्तात्रेय जयंती

तिथि / समयमार्गशीर्ष पूर्णिमा (सायंकाल)
देवतादत्तात्रेय
पालनदत्तात्रेय का प्राकट्य
कहाँमहाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात

दत्तात्रेय जयंती: महत्व और कथा

दत्तात्रेय जयंती भगवान दत्तात्रेय के प्राकट्य के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। यह पर्व मार्गशीर्ष पूर्णिमा को, विशेष रूप से सायंकाल के समय, मनाया जाता है। परंपरा में दत्तात्रेय को त्रिदेव — ब्रह्मा, विष्णु और महेश — के समन्वित स्वरूप के रूप में देखा जाता है, और इसी कारण यह तिथि उन भक्तों के लिए विशेष मानी जाती है जो ज्ञान, वैराग्य और गुरु-कृपा को जीवन का आधार मानते हैं।

इस दिन का स्वर उत्सव से अधिक साधना और स्मरण का है। भक्त व्रत रखते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं, और दत्तात्रेय के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। चूँकि यह तिथि पूर्णिमा से जुड़ी है, इसे चंद्रमा की पूर्णता और मन की स्थिरता का प्रतीक भी माना जाता है — यह भावना व्यक्तिगत फल की अपेक्षा से नहीं, बल्कि उपासना की निरंतरता से जुड़ी है।

कथा का सार

शास्त्रीय परंपरा में दत्तात्रेय का प्राकट्य अत्रि ऋषि और अनुसुइया के आशीर्वाद से जुड़ा है। त्रिदेव ने उनके पुत्र रूप में अवतरण किया, और इसी कारण दत्तात्रेय तीनों शक्तियों के समन्वय के प्रतीक बने। कथा के विभिन्न संस्करणों में विवरण भिन्न मिलते हैं, परंतु सार एक ही है — ज्ञान, तप और करुणा का संगम। इसीलिए दत्तात्रेय को गुरु परंपरा में भी आदर दिया जाता है।

तिथि कैसे निर्धारित होती है

दत्तात्रेय जयंती मार्गशीर्ष पूर्णिमा को मनाई जाती है, और इसका समय सायंकाल से जुड़ा है। पंचांग के अनुसार तिथि सूर्योदय से नहीं, बल्कि पूर्णिमा के व्यापक काल और उसके सायंकालीन प्रयोग से तय होती है। इसी कारण हर वर्ष ग्रेगोरियन तिथि बदलती रहती है, और उसकी गणना पंचांग से की जाती है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि हिंदू पर्व तिथि, नक्षत्र या सूर्य के राशि-प्रवेश के आधार पर तय होते हैं। इसलिए एक ही पर्व अलग-अलग नगरों में एक दिन आगे-पीछे हो सकता है, और अमांत तथा पूर्णिमांत पद्धतियों के बीच भी अंतर दिख सकता है। इस पृष्ठ पर दी गई तिथियाँ नई दिल्ली के सूर्योदय तथा लाहिरी अयनांश के आधार पर प्रस्तुत की जाती हैं, जिससे पाठक एक स्पष्ट संदर्भ ले सकें।

कैलेंडर में अंतर क्यों

इसलिए यदि किसी अन्य स्रोत पर एक दिन का अंतर दिखे, तो वह त्रुटि नहीं, बल्कि गणना-पद्धति का स्वाभाविक परिणाम हो सकता है। अपने नगर के पंचांग को प्रमाण मानना उचित रहता है।

पूजा विधि

दत्तात्रेय जयंती की उपासना सरल, स्वच्छ और शांत भाव से की जाती है। किसी विशेष फल की अपेक्षा किए बिना श्रद्धा और संयम पर बल दिया जाता है।

व्रत रखने वाले कई भक्त फलाहार पर रहते हैं, किंतु इसमें कोई कठोर अनिवार्यता

प्रश्न

दत्तात्रेय जयंती कब है?

दत्तात्रेय जयंती मार्गशीर्ष पूर्णिमा (सायंकाल) को मनाया जाता है; हर वर्ष की सटीक तारीख़ पंचांग से गणना करके इसी पृष्ठ पर दी जाती है।

दत्तात्रेय जयंती कहाँ मनाया जाता है?

महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात।

अलग-अलग पंचांगों में दत्तात्रेय जयंती की तारीख़ क्यों बदल सकती है?

हिंदू त्योहार किसी स्थान पर तिथि, नक्षत्र या सूर्य संक्रांति से तय होते हैं, इसलिए शहरों के बीच और अमांत व पूर्णिमांत पंचांगों के बीच एक दिन का अंतर हो सकता है। यहाँ तिथियाँ नई दिल्ली के सूर्योदय और लाहिरी अयनांश से हैं।

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